गीता में काम की बात यह है कि अपने शत्रुओं का अंत कर। जीतेगा तो राज्य भोगेगा और मरेगा तो स्वर्ग मिलेगा। यही गीता का एसेंस है। गीता में चरखा है ही नहीं।
और लोगों ने गीता को अध्यात्म से जोड़ रखा है। ये सब ठगंत्री लोग हैं जो सिंपल बात को रहस्यवाद में उलझा कर माल बनाने में लगे हैं। ये लोग उस वार्तालाप में भी अध्यात्म ढूंढ लेते हैं जो रणक्षेत्र के बीच में हुआ था। और यदि अध्यात्म कुछ होगा भी तो वह युद्ध से ही निकला होगा जो उस वार्ता के बाद हुआ।
(बीच में. उसके बाद भी कुछ अध्यात्म बचा होगा तो शायद मुझ जैसे अध्यात्म की कमी वाले को समझ न आया होगा।)
जीतेगा तो राज्य भोगेगा। यह तो स्ट्रेट फौरबड्ड है। लेकिन मरेगा तो स्वर्ग भोगेगा यह ऐसे समझ में नहीं आएगा।
युद्ध की स्थिति कब आती है? जब शत्रु आपके जीवन को नर्क बना देता है। आपके बचाव के रास्ते बंद कर अस्तित्व पर संकट डाल देता है। उस स्थिति में आप नर्क ही भोग रहे होते हैं। जैसे शत्रु ने कश्मीर से भगा दिया। टैंट में पड़े रहे। एक कमरे में चार पांच का परिवार। कोई प्रायवेसी नहीं। दशकों बीत गए। परिवार की महिलाएं वेश्याएं बन गई। यही सब नर्क है।
जैसे हिंदू आज पाकिस्तान बांगलादेश में और भारत के बहुत स्थानों पर नर्क भोग रहा है। बांगलादेश में हिंदू परिवारों की मां बेटी पोती के साथ एक साथ रेप किया जा रहा है उनके बेटे बाप भाईयों के सामने। पूर्णिमा की मां हिजादीयों से कहती है कि मेरी बेटी छोटी है अभी, एक- एक कर रेप करो। इससे बड़ा क्या नर्क होगा।
और भारत में हिंदू के आराध्य राम का आपमान हो रहा है और हिंदू हीही-हूहू में रमा है। यह नर्क ही है।
तो एक बार सामना कर के लड़ते-2 या जीत जाना या मर जाना, दोनों स्थितियों में ऐसे निकृष्ट जीवन से मुक्ति मिल जाती है। मर कर नर्क जैसे जीवन से मुक्ति मिलना स्वर्ग ही है।
हिंदू किताबों को पूजता रहता है। किताबें पूजने की वस्तु नहीं है। अव्वल तो गीता कोई अलग पुस्तक है ही नहीं। महाभारत काव्य में से बीच से उठाया गया संवाद है। किसी वस्तु की असली पूजा उसका उपयोग है।
यदि आज तक आतंक का मजहब नहीं जान पाए तो तुम्हारा गीता-गीता करना मात्र ढोंग है।
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